Short Story: एक रात का सफर- क्या हुआ अक्षरा के साथ?
अक्षरा अकेले बस में सफर कर रही थी. अपनी सुरक्षा के प्रति उस के जेहन में तरहतरह के सवाल कौंध रहे थे,
लेकिन ऐसा क्या हुआ कि उस का यह सफर खुशीखुशी संपन्न हो गया.
लेखिका- सोनी किशोर सिंह
बस के हौर्न देते ही सभी यात्री जल्दीजल्दी अपनीअपनी सीटों पर बैठने लगे. अक्षरा ने बंद खिड़की से ही हाथ हिला कर चाचाचाची को बाय किया. उधर से चाचाजी भी हाथ हिलाते हुए जोर से बोले,
‘‘मैं ने कंडक्टर को कह दिया है कि बगल वाली सीट पर किसी महिला को ही बैठाए और पहुंचते ही फोन कर देना.’’
बस चल दी. अक्षरा खिड़की का शीशा खोलने की कोशिश करने लगी ताकि ठंडी हवा के झोंकों से उसे उलटी का एहसास न हो,
मगर शीशा टस से मस नहीं हुआ तो उस ने कंडक्टर से शीशा खोल देने को कहा. कंडक्टर ने पूरा शीशा खोल दिया.
अक्षरा की बगल वाली सीट अभी भी खाली थी. उधर कंडक्टर एक दंपती से कह रहा था,
‘‘भाई साहब, प्लीज आप आगे वाली सीट पर बैठ जाएं तो आप की मैडम के साथ एक लड़की को बैठा दूं,
देखिए न रातभर का सफर है,
कैसे बेचारी पुरुष के साथ बैठेगी?’’
अक्षरा ने मुड़ कर देखा,
कंडक्टर पीछे वाली सीट पर बैठे युवा जोड़े से कह रहा था. आदमी तो आगे आने के लिए मान गया पर औरत की खीज को भांप अक्षरा बोली,
‘‘मुझे उलटी होती है,
उन से कहिए न मुझे खिड़की की तरफ वाली सीट दे दें.’’
‘‘वह सब आप खुद देख लीजिए,’’
कंडक्टर ने दो टूक लहजे में कहा तो अक्षरा झल्ला कर बोली,
‘‘तो फिर मुझे नहीं जाना,
मैं अपनी सीट पर ही ठीक हूं.’’
कंडक्टर भी अव्वल दर्जे का जिद्दी था. वह तुनक कर बोला,
‘‘अब आप की बगल में कोई पुरुष आ कर बैठेगा तो मुझे कुछ मत बोलिएगा,
आप के पेरैंट्स ने कहा था इसलिए मैं ने आप के लिए महिला के साथ की सीट अरेंज की.’’
तभी झटके से बस रुकी और एक दादानुमा लड़का बस में चढ़ा और लपक कर ड्राइवर का कौलर पकड़ कर बोला,
‘‘क्यों बे, मुझे छोड़ कर भागा जा रहा था,
मेरे पहुंचे बिना बस कैसे चला दी तू ने?’’
ड्राइवर डर गया. मौका
देख कर कंडक्टर ने हाथ जोड़ते हुए बात खत्म करनी चाही,
‘‘आइए बैठिए, देखिए न बारिश का मौसम है इसीलिए,
नहीं तो आप के बगैर….’’ उस
ने लड़के को अक्षरा की बगल वाली सीट पर ही बैठा दिया.
अक्षरा समझ गई कि कंडक्टर बात न मानने का बदला ले रहा था. उस ने खिड़की की तरफ मुंह कर लिया.
बारिश शुरू हो चुकी थी और बस अपनी रफ्तार पकड़ने लगी थी. टेढ़ेमेढ़े घुमावदार पहाड़ी रास्तों पर अपने गंतव्य की ओर बढ़ती बस के शीशों से बारिश का पानी रिसरिस कर अंदर आने लगा. सभी अपनीअपनी खिड़कियां बंद किए हुए थे. अक्षरा ने भी अपनी खिड़की बंद करनी चाही,
लेकिन शीशा अपनी जगह से टस से मस नहीं हुआ. उस ने इधरउधर देखा,
कंडक्टर आगे जा कर बैठ गया था. पानी रिसते हुए अक्षरा को भिगा रहा था.
तभी बगल वाले लड़के ने पूछा,
‘‘खिड़की बंद करनी है तो मैं कर देता हूं.’’
अक्षरा ने कोई उत्तर नहीं दिया. फिर भी उस ने उठ कर पूरी ताकत लगा कर खिड़की बंद कर दी. पानी का रिसना बंद हो गया,
बाहर बारिश भी तेज हो गई थी.
अक्षरा खिड़की बंद होते ही अकुलाने लगी. उमस और बस के धुएं की गंध से उस का जी मिचलाने लगा था. बाहर बारिश काफी तेज थी लेकिन उस की परवाह न करते हुए उस ने शीशे को सरकाना चाहा तो लड़के ने उठ कर फुरती से खिड़की खोल दी.
अक्षरा उलटी करने लगी. थोड़ी देर तक उलटी करने के बाद वह शांत हुई मगर तब तक उस के बाल और कपड़े काफी भीग चुके थे.
बगल में बैठे लड़के ने आत्मीयता से पूछा,
‘‘आप की तबीयत तो ठीक है,
मैं पानी दूं,
कुल्ला कर लीजिए.’’
अक्षरा अनमने भाव से बोली,
‘‘मेरे पास पानी है.’’
वह फिर बोला,
‘‘आप अकेली ही जा रही हैं,
आप के साथ और कोई नहीं है?’’
अक्षरा इस सवाल से असहज हो
उठी, ‘‘क्यों मेरे अकेले जाने से आप को क्या लेना?’’
‘‘जी, मैं तो यों ही पूछ रहा था,’’
लड़के को भी लगा कि शायद वह गलत सवाल पूछ बैठा है,
लिहाजा वह दूसरी तरफ देखने लगा.
थोड़ी देर तक बस में शांति छाई रही. बस के अंदर की बत्ती भी बंद हो चुकी थी. तभी ड्राइवर ने टेपरिकौर्डर चला दिया. कोई अंगरेजी गाना था,
बोल तो स्पष्ट नहीं थे पर कानफोड़ू संगीत गूंज उठा.
तभी पीछे से कोई चिल्लाया,
‘‘अरे, ओ ड्राइवरजी, बंद कीजिए इसे. अंगरेजी समझ में नहीं आती हमें. कुछ हिंदी में बजाइए.’’
कुछ देर बाद एक पुरानी हिंदी फिल्म का गाना बजने लगा.
रात काफी बीत चुकी थी,
बारिश कभी कम तो कभी तेज हो रही थी. बस पहाड़ी रास्ते की सर्पीली ढलान पर आगे बढ़ रही थी. सड़क के दोनों तरफ उगी जंगली झाडि़यां अंधेरे में तरहतरह की आकृतियों का आभास करवा रही थीं. बारिश फिर तेज हो उठी. अक्षरा ने बगल वाले लड़के को देखा,
वह शायद सो चुका था. वह चुपचाप बैठी रही.
पानी का तेज झोंका जब अक्षरा को भिगोते हुए आगे बढ़ कर लड़के को भी गिरफ्त में लेने लगा तो वह जाग गया,
‘‘अरे, इतनी तेज बारिश है आप ने उठाया भी नहीं,‘‘
कहते हुए उस ने खिड़की बंद कर दी.
थोड़ी देर बाद बारिश थमी तो खुद ही उठ कर खिड़की खोल भी दी और बोला,
‘‘फिर बंद करनी हो तो बोलिएगा,’’
और आंखें बंद कर लीं.
अक्षरा ने घड़ी पर नजर डाली,
सुबह के 3 बज रहे थे,
नींद से उस की आंखें बोझिल हो रही थीं. उस ने खिड़की पर सिर टेक कर सोना चाहा,
तभी उसे लगा कि लड़के का पैर उस के सामने की जगह पर फैला हुआ है. उस ने डांटने के लिए जैसे ही लड़के की तरफ सिर घुमाया तो देखा कि उस ने अपना सिर दूसरी तरफ झुका रखा था और नींद की वजह से तिरछा हो गया था और उस का पैर अपनी सीट के बजाय अक्षरा की सीट के सामने फैल गया था. अक्षरा उस की शराफत पर पहली बार मुसकराई.
सुबह के 6 बजे बस गंतव्य पर पहुंची. वह लड़का उठा और धड़धड़ाते हुए कंडक्टर के पास पहुंचा,
‘‘उस लड़की का सामान उतार दे और जिधर जाना हो उधर के आटो पर बैठा देना. एक बात और सुन ले जानबूझ कर तू ने मुझे वहां बैठाया था,
आगे से किसी भी लड़की के साथ मेरे जैसों को बैठाया तो मुझ से बुरा कोई नहीं होगा. फिर वह उतर कर तेज कदमों से चला गया.’’
अक्षरा के मस्तिष्क में कई सवाल एकसाथ कौंध गए. उसे जहां उस लड़के की सहायता के बदले धन्यवाद न कहने का मलाल था,
वहीं इस जमाने में भी इंसानियत और भलाई की मौजूदगी का एहसास.

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