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सोचना आसान था: कविता 💢

सोचना आसान था: कविता 💢

 सोचना आसान था

 


लेखक - आर्यपुत्र
 आर्यन सिंह यादव

ना सोचा था कभी हमने क्या किस्मत का नजारा है


बदलता वक्त भी पल में ये प्रकृति का पिटारा है

सरल है क्या कठिन जग में समझ ना लोग पाते हैं

ना कुछ यहां पर हमारा है ना कुछ यहां पर तुम्हारा है !!


जो देखा दृश्य दुनिया में चकित हृदय हमारा था

समझ ना कुछ सका तब मैं खड़ा बेबस बेचारा था

क्या करें ना करें जीवन की परिभाषा ना जानता -

करूंगा बस वही कर्तव्य जो निश्चय हमारा है !!

ठान कर दिल में वो इच्छा थी करने कि मैंने ठानी

लोग थे हंस रहे मुझ पर किसी की बात ना मानी

था मैं मानता दुनिया में सारा ही दिखावा है -

मुझे तो लक्ष्य बस मेरा हुआ प्राणों से प्यारा है !!


था दृढ़ निश्चय मेरे मन में लेकिन मुझको ना ज्ञान था

रास्तों की कठिनता का मुझे बिल्कुल ना भान था

नहीं परिणाम की चिंता मुझे कर्तव्य करना था -

आज भी लक्ष्य पाने को ये दिल आशिक आवारा है !!


जिंदगी थी कठिन लगती घड़ी थी इम्तिहान की

जूझता था मैं खतरों से ना मुझको चिंता प्राण की

मुझे मंजूर था मरना मगर ना हार मानता -

मर्द है वो जो मुश्किल में नहीं करता किनारा है !!


मैं खुद कहता हूं शब्दों में नहीं औकात कुछ मेरी

हूं सबसे निम्न स्तर का ना कहने में करू देरी

ना होगा कुछ जमाने से ये जबरन मुंह लड़ाने से -

जिसे कर्तव्य हो प्यारा वही दुनिया से न्यारा है !!


पता था चल रहा मुझको कठिन मेरा अरमान था

हकीकत अब समझ आई सोचना तो आसान था

ना ख्वाबों में कभी होते हमारे सपने ये पूरे -

परिश्रम की जरूरत है अगर निर्णय विचारा है !!


नहीं मुश्किल है सोचना मगर करते चलो भैया

डरो मत चंद खतरों से यही तो लक्ष्य की नैया

बनोगे क्रांति दुनिया में अगर चलते रहे हर पल -

सिकंदर सी उमंगे हो मगर स्वारथ गंवारा है !!


रुकूंगा एक पल भी ना जब तक प्राण है तन में

हौसलें कम नहीं होंगे सदा संकल्प ये मन में

जरूरत है जो करने की करूंगा आन आर्यन का -

हाँ इससे बच निकलने का बचा ना कोई चारा है !!

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