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बाढ़,वह आग नही वो बढ़ था,  वह बढ़ का प्रकोप था।

बाढ़,वह आग नही वो बढ़ था, वह बढ़ का प्रकोप था।

बाढ़


लेखक – श्रवण कुमार (सिरौली)

 वह आग नही वो बढ़ था,

वह बढ़ का प्रकोप था।

ये थी कैसी आपदा

सफेद चादर ओढ़े हुए,

जान जीवन को प्रभावित क्षीण भिन्न किए हुए।

वह सड़क था या घाट था

जो लोगो का निवास था।

कटती जहां थी रातें या वह ऊंची मैदान था।

यह बड़ी अकाल था न कोई धीर था,

लोगों का शरीर था वह कांटों का लकीर था।

कभी सुखा कभी बाढ़ है या कभी अकाल है।

कृषकों की जीवन बहुत ही बेहाल है।

बेअन्न था बेघर था, जान जीवन जलमग्न था।

इस जलमग्न दुनिया में जल को भी घमंड था।

वह आग नही बाढ़ था

वह बाढ़ का प्रकोप था।

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